नई दिल्ली. दुनियाभर को सस्ती और लाइफ-सेविंग दवाएं सप्लाई करने वाले भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने झटका दिया है. ट्रंप ने एक नई दवा पॉलिसी का ऐलान किया है. यह नीति भारत के लिए किसी ‘कड़वी डोज’ से कम
नहीं है. ट्रंप की नई नीति के अनुसार, अगले दो वर्षों तक अमेरिका आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर कोई टैरिफ नहीं लगाएगा. लेकिन इसके बाद यदि दवा कंपनियां अमेरिका में प्रोडक्शन शुरू नहीं करतीं हैं तो पहले 100% और बाद में 200% तक टैरिफ लगाया जाएगा. अमेरिका भारतीय फार्मा उद्योग का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है. भारत हर साल अमेरिका को 9-10 अरब डॉलर मूल्य की जेनेरिक दवाओं का निर्यात करता है. यही वजह है कि ट्रंप के टैरिफ का सबसे ज्यादा असर भारत होगा.
आज इसका असर शेयर बाजार में दिख भी गया. निफ्टी फार्मा इंडेक्स आज दो फीसदी गिर गया. फार्मा सेक्टर की लगभग सभी कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखी जा रही है. सबसे ज्यादा गिरावट अरबिंदो फार्मा के शेयरों में आई है और ये 2.6 फीसदी तक गिरे हैं. ग्लेनमार्क फार्मा और जाइडस लाइफसाइंसेज के शेय 2.5 फीसदी टूट गए हैं. ल्यूपिन और सिप्ला के शेयरों में 2 फीसदी लुढ़क गए हैं. बायोकॉन, अजंता फार्मा, सन फार्मा, एल्केम लैबोरेटरीज, डॉ. रेड्डीज़ लैबोरेटरीज, ग्लैंड फार्मा, मैनकाइंड फार्मा और डिवीज़ लैबोरेटरीज के शेयर भी लाल निशान में कारोबार कर रहे हैं.
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क्या चाहते हैं ट्रंप?
ट्रंप का प्लान एकदम साफ है. वे चाहते हैं कि विदेशी दवा कंपनियां अमेरिका में ही आकर अपनी मैन्युफैक्चरिंग शुरू करें. इसके लिए उन्होंने कंपनियों को 2 साल की छूट दी है. हालांकि, यह प्रस्ताव अभी औपचारिक नीति और नियम बनाने की प्रक्रिया से गुजरना बाकी है, इसलिए इसमें बदलाव संभव है. लेकिन, अगर यह नीति, ट्रंप की घोषणा के अनुसार ही लागू होती है तो फिर भारतीय दवा कंपनियों के लिए भारी मुश्किल हो सकती है.
भारतीय पर कितना होगा असर?
भारत में सबसे ज्यादा जेनरिक दवाएं बनती हैं. इसलिए इस “दुनिया की फार्मेसी” कहा जाता है. भारत अमेरिका का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा सप्लायर है. एंटीबायोटिक्स से लेकर कैंसर और डायबिटीज तक की सस्ती दवाएं भारत ही अमेरिका को भेजता है. अगर अमेरिका में 200% टैरिफ लागू हो गया, तो भारत में बनी दवाएं अमेरिका में महंगी हो जाएगी. इससे इनकी मांग घटेगी, जिसका सीधा असर भारतीय दवा निर्यात पर होगा.
किसे होगा ज्यादा नुकसान?
इस नई नीति का सबसे ज्यादा असर उन भारतीय कंपनियों पर पड़ेगा जो पूरी तरह से भारत में बनी दवाएं अमेरिका भेजती हैं. कई छोटी और मीडियम कंपनियों के पास अमेरिका में करोड़ों डॉलर लगाकर नए प्लांट लगाने या वहां की एफडीए (US FDA) से कड़े अप्रूवल लेने का बजट नहीं होता. इन पर सबसे ज्यादा गाज गिरेगी. सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लैबोरेट्रीज, अरबिंदो फार्मा, ल्यूपिन, ज़ाइडस लाइफसाइंसेज, सिप्ला, ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स और टोरेंट फार्मास्युटिकल्स जैसी बड़ी कंपनियों पर भी इसका असर होगा. इनमें से कई कंपनियों के पास अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट है. लेकिन, वे अमेरिकी मांग को पूरा करने के लिए काफी नहीं है. दूसरा, अमेरिका में दवा बनाना महंगा भी है.
क्या 2 साल में अमेरिका शिफ्ट हो सकती हैं कंपनियां?
दवा बनाना कोई कपड़े या खिलौने बनाने जैसा आसान काम नहीं है. एक नया फार्मा प्लांट लगाने में बहुत बड़ा खर्च आता है. साथ ही, अमेरिका के कड़े नियमों, इंस्पेक्शन और सप्लाई चेन को सेट करने में बहुत ज्यादा समय लगता है. यही वजह है कि 2 साल का समय भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए काफी कम और चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.
क्या अमेरिका में दवाएं महंगी हो जाएंगी?
अमेरिका में अधिकांश मरीजों को जेनेरिक दवाएं दी जाती हैं क्योंकि वे ब्रांडेड दवाओं की तुलना में काफी सस्ती होती हैं. यदि टैरिफ के कारण आयात लागत बढ़ती है, तो दवा के दाम बढ़ेंगे और इसका असर बीमा कंपनियों और अंततः मरीजों पर पड़ेगा. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्लेषकों का कहना है कि यदि कुछ कंपनियां अमेरिका को दवाएं निर्यात करना आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं समझेंगी, तो वहां दवाओं की कमी की समस्या और बढ़ सकती है.
क्या भारत को छूट मिल सकती है?
इस टैरिफ से भारत को छूट मिलेगी, ऐसा मुश्किल दिखता है. हां, इतना जरूर है कि आने वाले समय में भारत-अमेरिका ट्रेड डील में फार्मास्युटिकल क्षेत्र प्रमुख मुद्दा बन सकता है. भारत आवश्यक दवाओं के लिए विशेष छूट और कम टैरिफ की मांग कर सकता है. हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रंप की व्यापार नीति का अंतिम स्वरूप क्या होता है और दोनों देशों के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है.














