पुलीकट झील: आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का साझा खजाना
चिल्का के बाद भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील, पुलीकट, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों की सीमा पर स्थित है। इस झील का लगभग 96% हिस्सा आंध्र प्रदेश में और बाकी 4% तमिलनाडु में पड़ता है। यह एक
लैगून झील है, जिसे श्रीहरिकोटा द्वीप बंगाल की खाड़ी से अलग करता है। यही द्वीप सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र का घर भी है, जो इसे विज्ञान और प्रकृति का एक अनूठा संगम बनाता है। पुलीकट झील सिर्फ अपने आकार के लिए ही नहीं, बल्कि अपने समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी प्रसिद्ध है। यह हर साल हजारों प्रवासी पक्षियों, विशेषकर राजहंस (फ्लेमिंगो) का स्वागत करती है, जो इसे पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग बना देता है। मछली पकड़ना यहाँ के स्थानीय समुदायों का मुख्य व्यवसाय है, जिससे यह झील दोनों राज्यों के हजारों मछुआरों की आजीविका का स्रोत भी है।
गोविंद बल्लभ पंत सागर: उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर मानव निर्मित विशालता
गोविंद बल्लभ पंत सागर, जिसे रिहंद बांध जलाशय के रूप में भी जाना जाता है, भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील है। यह विशाल जलाशय उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में स्थित है और इसकी सीमा मध्य प्रदेश से लगती है। इसका निर्माण रिहंद नदी पर बने बांध के कारण हुआ है, जो सोन नदी की एक सहायक नदी है। यह झील सिर्फ एक इंजीनियरिंग का चमत्कार ही नहीं है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के लिए जीवनदायिनी भी है। यह कई ताप विद्युत संयंत्रों को पानी की आपूर्ति करती है और सिंचाई के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसका लाभ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के अलावा बिहार जैसे राज्यों को भी मिलता है। इस झील का बनना विकास का प्रतीक था, लेकिन इसके निर्माण के कारण लगभग एक लाख लोगों को विस्थापित भी होना पड़ा था, जो बड़े विकास परियोजनाओं के सामाजिक प्रभाव को दर्शाता है।
गोबिंद सागर झील: हिमाचल प्रदेश और पंजाब की सीमा पर एक शांत जलाशय
सतलुज नदी पर बने भाखड़ा बांध के निर्माण से बनी गोबिंद सागर झील हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर और ऊना जिलों में फैली है, जो पंजाब की सीमा के करीब है। इसका नाम सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के सम्मान में रखा गया है। यह दुनिया के सबसे ऊंचे गुरुत्वाकर्षण बांधों में से एक, भाखड़ा नांगल बांध द्वारा बनाया गया एक विशाल जलाशय है। यह झील न केवल पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों को सिंचाई और बिजली के लिए पानी मुहैया कराती है, बल्कि पर्यटन और जल क्रीड़ा का एक प्रमुख केंद्र भी है। यहाँ वाटर स्कीइंग, सेलिंग और वाटर स्कूटर रेसिंग जैसी गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। 1962 में इसे जलपक्षी अभयारण्य घोषित किया गया था, और यह मछली पकड़ने का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जहाँ पचास से अधिक प्रजातियों की मछलियाँ पाई जाती हैं।
सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व
ये झीलें केवल भौगोलिक सीमाएं ही नहीं हैं, बल्कि ये सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान के केंद्र भी हैं। पुलीकट के तट पर बसे गांव आंध्र और तमिल दोनों संस्कृतियों की झलक दिखाते हैं। इसी तरह, गोबिंद सागर झील का नाम सिख गुरु के नाम पर होना इस क्षेत्र की गहरी ऐतिहासिक और धार्मिक जड़ों को दर्शाता है। ये जलाशय अपने आसपास एक अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र का पोषण करते हैं, जो विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों, जीवों और विशेष रूप से पक्षियों की प्रजातियों को आकर्षित करते हैं। इन झीलों का अस्तित्व यह साबित करता है कि प्रकृति किसी भी मानव निर्मित सीमा को नहीं मानती और साझा संसाधनों के संरक्षण और सम्मान का एक शक्तिशाली संदेश देती है। इनका प्रबंधन दोनों राज्यों के बीच सहयोग की एक मिसाल है, जो यह सुनिश्चित करता है कि आने वाली पीढ़ियां भी इन प्राकृतिक धरोहरों का लाभ उठा सकें।













