मानसून का मतलब: सिर्फ़ बारिश नहीं
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि मानसून सिर्फ़ बारिश का नाम नहीं है। यह असल में हवाओं के बहाव की दिशा में एक बड़े मौसमी बदलाव का नाम है। [4] 'मानसून' शब्द अरबी के 'मौसिम' से आया है, जिसका मतलब ही 'मौसम'
या 'ऋतु' होता है। [21] इन हवाओं के साथ नमी आती है, जो बारिश का कारण बनती है, लेकिन इसका मूल आधार हवाओं का दिशा बदलना है। साल के कुछ महीने हवाएँ समुद्र से ज़मीन की ओर चलती हैं (ग्रीष्मकालीन मानसून), और बाकी महीने ज़मीन से समुद्र की ओर (शीतकालीन मानसून)। [4] जब हम भारत में मानसून की बात करते हैं, तो हमारा मतलब दक्षिण-पश्चिम ग्रीष्मकालीन मानसून से होता है जो भारी बारिश लाता है। [16]
समय की सटीकता का राज़: सूरज और पृथ्वी का रिश्ता
मानसून के लगभग एक ही समय पर आने का मुख्य कारण पृथ्वी का अपनी धुरी पर झुकाव और सूर्य के चारों ओर इसकी परिक्रमा है। यह एक खगोलीय घटना है जो हर साल एक ही चक्र में दोहराई जाती है। गर्मियों के महीनों में, पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुक जाता है, जिससे सूर्य की सीधी किरणें कर्क रेखा के आसपास पड़ती हैं। [5] यह प्रक्रिया हर साल मार्च से जून के बीच होती है। इसी कारण भारतीय उपमहाद्वीप और तिब्बत का विशाल पठार तेज़ी से गर्म होने लगता है। यह गर्मी एक निश्चित वार्षिक चक्र का पालन करती है, जो मानसून की घड़ी को सेट करती है।
ज़मीन और समुद्र की तापमान वाली पहेली
जब सूरज उत्तरी गोलार्ध में होता है, तो भारत की ज़मीन और उसके आसपास का हिंद महासागर दोनों गर्म होते हैं, लेकिन एक ही दर से नहीं। ज़मीन पानी की तुलना में बहुत तेज़ी से गर्म होती है। [14] नतीजतन, मई और जून तक उत्तर और मध्य भारत की ज़मीन बहुत गर्म हो जाती है। गर्म हवा हल्की होकर ऊपर उठती है, जिससे इस पूरे इलाके में एक विशाल 'कम दबाव का क्षेत्र' (Low-Pressure Area) बन जाता है। [2, 3] इसकी तुलना में, हिंद महासागर की सतह ठंडी रहती है, जिससे वहां 'उच्च दबाव का क्षेत्र' (High-Pressure Area) बना रहता है। [8] हवा का सीधा सा नियम है कि वह उच्च दबाव से कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर बहती है।
तिब्बत का पठार: मानसून का विशाल इंजन
इस पूरी प्रक्रिया में तिब्बत के पठार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। यह दुनिया का सबसे ऊँचा और सबसे बड़ा पठार है। [15] गर्मियों में यह पठार एक विशाल हीटर की तरह काम करता है, जो अपने ऊपर की हवा को बहुत ज़्यादा गर्म कर देता है। यह भारतीय उपमहाद्वीप पर बने कम दबाव के क्षेत्र को और भी ज़्यादा शक्तिशाली बना देता है। [17] कुछ मौसम विज्ञानी मानते हैं कि तिब्बती पठार का यह तापीय प्रभाव ही मानसून को अपनी ओर खींचने वाली असली ताकत है। [18] इसके साथ ही, जेट स्ट्रीम नामक तेज़ हवाओं का प्रवाह भी अपनी स्थिति बदलता है और तिब्बत के पठार के उत्तर में चला जाता है, जो मानसूनी हवाओं के लिए रास्ता बनाता है। [5]
तो क्या मानसून कभी देर नहीं होता?
हालांकि मानसून का आगमन एक नियमित प्रक्रिया है, लेकिन हर साल इसकी तारीख़ या तीव्रता में थोड़ा-बहुत अंतर ज़रूर होता है। 1 जून को केरल में मानसून की शुरुआत एक औसत तारीख़ है, जिसमें एक हफ़्ते का विचलन सामान्य माना जाता है। [14] इस पर कई वैश्विक कारक असर डालते हैं। अल-नीनो (El Niño) और ला-नीना (La Niña) जैसी घटनाएँ, जो प्रशांत महासागर के तापमान से जुड़ी हैं, भारतीय मानसून को काफ़ी प्रभावित कर सकती हैं। [16] इसी तरह हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole) भी मानसून की शक्ति और समय को बदल सकता है। [10] ये कारक मिलकर तय करते हैं कि किसी साल मानसून सामान्य होगा, मज़बूत होगा या कमज़ोर।














