डी ला फुएंते की बदली हुई रणनीति
इस जीत का सबसे बड़ा श्रेय कोच लुइस डी ला फुएंते की रणनीति को जाता है। उन्होंने स्पेन के पारंपरिक 'टिकी-टाका' यानी सिर्फ गेंद पास करते रहने के खेल से आगे बढ़कर टीम को ज़्यादा आक्रामक और लचीला बनाया। उनका नया
मंत्र था - गेंद पर कब्ज़ा रखो, लेकिन मौका मिलते ही तेज़ी से हमला करो। स्पेन की टीम अब सिर्फ गेंद को घुमाकर对手 को थकाती नहीं, बल्कि गेंद जीतते ही सीधे विंगर्स को पास देकर जवाबी हमला बोल देती थी। यह वर्टिकल गेमप्ले यानी तेज़ी से आगे बढ़ने की रणनीति उन टीमों के खिलाफ कारगर साबित हुई जो गहरे डिफेंस के लिए जानी जाती हैं। इस नई सोच ने स्पेन को एक ऐसी टीम बना दिया जिसके पास हर सवाल का जवाब था।
युवा जोश और अनुभव का शानदार मिश्रण
इस टीम की ख़ासियत थी युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का संतुलन। एक तरफ कप्तान रोड्री जैसे अनुभवी खिलाड़ी थे, जो मिडफ़ील्ड को किसी सेनापति की तरह नियंत्रित कर रहे थे। तो दूसरी ओर लामिन यमाल और पाउ कुबारसी जैसे युवा सितारे थे, जिन्होंने अपनी गति और प्रतिभा से सबको चौंका दिया। यमाल ने पूरे टूर्नामेंट में अपनी ड्रिब्लिंग क्षमता से बड़े-बड़े डिफेंडर्स को परेशान किया। फाइनल में एक तरफ 39 साल के मेसी थे तो दूसरी तरफ 20 साल के यमाल, यह पीढ़ियों का मुकाबला भी था। अनुभवी खिलाड़ियों ने टीम को स्थिरता दी, जबकि युवा खिलाड़ियों ने वो एक्स-फैक्टर जोड़ा जो बड़ी प्रतियोगिताओं को जीतने के लिए ज़रूरी होता है।
एक दीवार बन गया डिफेंस
किसी ने भी नहीं सोचा था कि आक्रामक फुटबॉल खेलने वाली स्पेन की टीम का डिफेंस इतना मज़बूत हो सकता है। स्पेन ने पूरे टूर्नामेंट में सिर्फ एक गोल खाया, जो बेल्जियम के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में हुआ था। फाइनल समेत आठ में से सात मैचों में टीम ने क्लीन शीट रखी, यानी कोई गोल नहीं होने दिया। गोलकीपर उनाई सिमोन ने रिकॉर्ड बनाते हुए शानदार बचाव किए, जबकि सेंटर-बैक में पाउ कुबारसी और एमेरिक लापोर्टे की जोड़ी चट्टान की तरह खड़ी रही। डी ला फुएंते की रणनीति का एक अहम हिस्सा 'रेस्ट डिफेंस' था, जिसका मतलब था कि जब टीम हमला कर रही हो, तब भी कुछ खिलाड़ी पीछे रहकर काउंटर अटैक रोकने के लिए तैयार रहते थे। इसी मज़बूत डिफेंस ने जीत की नींव रखी।
मुश्किल नॉकआउट दौर में दिखाया दम
वर्ल्ड कप जीतना कभी आसान नहीं होता, और स्पेन का रास्ता तो और भी मुश्किल था। नॉकआउट दौर में उन्होंने पुर्तगाल, बेल्जियम और सेमीफाइनल में फ्रांस जैसी मज़बूत टीमों को हराया। फाइनल में उनका सामना डिफेंडिंग चैंपियन अर्जेंटीना से था, जिनके पास लियोनेल मेसी जैसा दिग्गज था। मैच अतिरिक्त समय तक गया और अर्जेंटीना की टीम 10 खिलाड़ियों के साथ खेल रही थी। इसके बावजूद स्पेन ने अपना संयम नहीं खोया और लगातार हमले करता रहा। अंत में फेरान टोरेस ने 106वें मिनट में विजयी गोल दागकर साबित कर दिया कि यह टीम दबाव में बिखरने वाली नहीं, बल्कि और मज़बूत होकर खेलने वाली टीम है।











