एक परंपरा की शुरुआत
फुटबॉल खिलाड़ियों के साथ बच्चों के मैदान में आने की यह परंपरा, जिसे 'प्लेयर एस्कॉर्ट्स' या 'मैच मैस्कॉट' कहा जाता है, करीब तीन दशक पुरानी है। इसकी जड़ें 1970 के दशक के ब्राजील से जुड़ती हैं, जहां एक क्लब
ने दर्शकों, खासकर परिवारों को स्टेडियम तक लाने के लिए यह तरीका अपनाया था। हालांकि, इस प्रथा को वैश्विक पहचान 1990 के दशक के मध्य में मिली। 1996 में लिवरपूल और एवर्टन के बीच हुए एक मैच में भविष्य के स्टार फुटबॉलर वेन रूनी भी एक मैस्कॉट के तौर पर मैदान पर उतरे थे। लेकिन इसे एक नियमित परंपरा के रूप में यूईएफए यूरो 2000 में स्थापित किया गया, जहां हर खिलाड़ी एक बच्चे के साथ मैदान में दाखिल हुआ।
चैरिटी और सामाजिक जागरूकता
इस परंपरा के सबसे बड़े कारणों में से एक चैरिटी और सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूकता फैलाना है। 2002 के फीफा विश्व कप में, फीफा और यूनिसेफ ने मिलकर 'से यस फॉर चिल्ड्रन' (बच्चों के लिए हाँ कहें) नाम से एक अभियान चलाया। इसका मकसद दुनिया भर में बच्चों के अधिकारों और उनकी बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए जागरूकता फैलाना था। इस अभियान के तहत हर मैच से पहले खिलाड़ी बच्चों के साथ मैदान पर उतरे, जिससे इस मुहिम को एक वैश्विक मंच मिला। इसके बाद से, यह कई चैरिटी संस्थाओं के लिए धन जुटाने और अपने संदेश को लोगों तक पहुंचाने का एक शक्तिशाली माध्यम बन गया है।
अगली पीढ़ी को प्रेरणा
मैदान पर अपने हीरो का हाथ थामकर चलना किसी भी युवा फुटबॉल प्रशंसक के लिए एक सपने के सच होने जैसा होता है। यह अनुभव बच्चों को खेल से जुड़ने और उसे अपनाने के लिए प्रेरित करता है। यह खिलाड़ियों को भी याद दिलाता है कि वे लाखों बच्चों के लिए रोल मॉडल हैं और मैदान पर उनका व्यवहार इन नन्हे प्रशंसकों पर गहरा असर डालता है। यह खेल की अगली पीढ़ी को तैयार करने और उनमें खेल भावना को बढ़ावा देने का एक शानदार तरीका है। कई बार स्थानीय स्कूलों या युवा अकादमियों के बच्चों को यह मौका दिया जाता है, जिससे जमीनी स्तर पर फुटबॉल को बढ़ावा मिलता है।
सकारात्मक छवि और प्रशंसक सुरक्षा
बच्चों की मौजूदगी खेल और खिलाड़ियों की एक सकारात्मक और परिवार-अनुकूल छवि पेश करती है। इससे यह संदेश जाता है कि फुटबॉल सिर्फ एक आक्रामक खेल नहीं, बल्कि एक ऐसा आयोजन है जिसका आनंद पूरा परिवार एक साथ ले सकता है। इसके अलावा, एक दिलचस्प लेकिन अनकहा कारण प्रशंसक सुरक्षा से भी जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि मैदान पर बच्चों की मौजूदगी में आक्रामक दर्शक मैदान पर चीजें फेंकने या उपद्रव करने से हिचकते हैं। इस तरह, ये बच्चे अनजाने में खिलाड़ियों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम भी करते हैं।
कैसे मिलता है यह मौका?
प्लेयर मैस्कॉट बनने का मौका कई तरीकों से मिल सकता है। कई क्लब अपनी जूनियर अकादमी के सदस्यों या स्थानीय स्कूलों के बच्चों को यह अवसर देते हैं। कुछ क्लब और प्रायोजक जैसे कि मैकडॉनल्ड्स, प्रतियोगिताओं या लॉटरी के माध्यम से बच्चों का चयन करते हैं। कभी-कभी, गंभीर रूप से बीमार या वंचित बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए 'मेक-ए-विश' जैसी संस्थाओं के माध्यम से उन्हें चुना जाता है। हालांकि, यह भी एक तथ्य है कि कुछ बड़े क्लबों में यह एक पेड पैकेज का हिस्सा होता है, जिसके लिए माता-पिता को एक बड़ी रकम चुकानी पड़ती है। यह प्रथा चैरिटी की मूल भावना के विपरीत होने के कारण कभी-कभी विवादों में भी रहती है।













