शुक्र ग्रह ही क्यों?
शुक्र को अक्सर 'पृथ्वी की जुड़वां बहन' कहा जाता है क्योंकि दोनों का आकार, द्रव्यमान और घनत्व लगभग एक समान है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अरबों साल पहले शुक्र की जलवायु भी पृथ्वी जैसी ही थी, जहाँ संभवतः
पानी के महासागर भी मौजूद थे। लेकिन आज यह ग्रह एक 'नरक' में तब्दील हो चुका है। इसकी सतह का तापमान 460 डिग्री सेल्सियस से अधिक है, जो सीसे को भी पिघला सकता है, और वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी की तुलना में 90 गुना ज्यादा है। वैज्ञानिक यह समझने के लिए उत्सुक हैं कि पृथ्वी और शुक्र की विकास यात्रा इतनी अलग क्यों रही। शुक्र का अध्ययन हमें यह समझने में मदद कर सकता है कि किसी ग्रह पर जलवायु परिवर्तन कैसे बेकाबू हो सकता है, जो हमारी अपनी पृथ्वी के भविष्य के लिए भी एक चेतावनी हो सकती है।
शुक्रयान मिशन के मुख्य उद्देश्य
इसरो का वीनस ऑर्बिटर मिशन (VOM), जिसे अनौपचारिक रूप से शुक्रयान कहा जाता है, एक ऑर्बिटर मिशन होगा। इसका मतलब है कि एक अंतरिक्ष यान शुक्र की कक्षा में चक्कर लगाएगा और वहां से अपने वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से डेटा इकट्ठा करेगा। मिशन के प्राथमिक उद्देश्यों में शामिल हैं: ग्रह की सतह और उप-सतह की बनावट का अध्ययन करना, जो अब तक काफी हद तक एक रहस्य है। इसके लिए पहली बार ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल किया जाएगा। साथ ही, शुक्र के घने और जहरीले वायुमंडल की संरचना, उसकी गतिशीलता और रासायनिक प्रक्रियाओं को समझना भी एक बड़ा लक्ष्य है। यह मिशन यह भी जांच करेगा कि सौर हवाएं शुक्र के आयनमंडल के साथ कैसे संपर्क करती हैं।
अत्याधुनिक उपकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
शुक्रयान मिशन लगभग 100 किलोग्राम के वैज्ञानिक उपकरणों (पेलोड) से लैस होगा। इसका सबसे महत्वपूर्ण उपकरण एक हाई-रिजॉल्यूशन सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) है। यह रडार शुक्र के घने सल्फ्यूरिक एसिड के बादलों को भेदकर उसकी सतह का विस्तृत नक्शा तैयार करने में सक्षम होगा। मिशन में भारत में बने 16 उपकरणों के अलावा अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी शामिल है। रूस, फ्रांस, स्वीडन और जर्मनी जैसे देश भी इस मिशन के लिए अपने वैज्ञानिक उपकरण प्रदान कर रहे हैं, जो इसे एक वैश्विक वैज्ञानिक प्रयास बनाता है।
'नर्क' जैसे ग्रह की चुनौतियां
शुक्र पर मिशन भेजना आसान नहीं है। अत्यधिक तापमान और दबाव अंतरिक्ष यान के इलेक्ट्रॉनिक्स को कुछ ही मिनटों में नष्ट कर सकते हैं। शुक्र का वायुमंडल सल्फ्यूरिक एसिड के बादलों से भरा है, जो किसी भी उपकरण के लिए बेहद संक्षारक (corrosive) है। इन चरम स्थितियों के कारण आज तक कोई भी लैंडर शुक्र की सतह पर कुछ घंटों से ज्यादा नहीं टिक पाया है। शुक्रयान एक ऑर्बिटर मिशन है, इसलिए उसे इन सतही चुनौतियों का सीधा सामना नहीं करना पड़ेगा, लेकिन फिर भी उसके उपकरणों को ग्रह के कठोर वातावरण और विकिरण से बचाने के लिए विशेष इंजीनियरिंग की आवश्यकता होगी।
कब भरेगा शुक्र के लिए उड़ान?
इसरो के इस महत्वाकांक्षी मिशन को भारत सरकार ने सितंबर 2024 में औपचारिक मंजूरी दे दी थी। वर्तमान योजना के अनुसार, शुक्रयान को मार्च 2028 में लॉन्च करने का लक्ष्य रखा गया है। इसे भारत के सबसे शक्तिशाली रॉकेट, LVM-3 (जिसे पहले GSLV Mk III के नाम से जाना जाता था) द्वारा प्रक्षेपित किया जाएगा। पृथ्वी से शुक्र तक की यात्रा में इसे लगभग चार महीने लगेंगे, जिसके बाद यह शुक्र की एक अंडाकार कक्षा में स्थापित हो जाएगा। यदि किसी कारण से 2028 की समय-सीमा चूक जाती है, तो अगला अनुकूल लॉन्च अवसर 2031 में आएगा।















