एक खिलाड़ी नहीं, एक सामूहिक 'पिंजरा'
अक्सर टीमें मेसी को रोकने के लिए एक खिलाड़ी को उनके पीछे लगा देती हैं, जिसे 'मैन-मार्किंग' कहते हैं। लेकिन स्पेन के कोच लुइस दे ला फुएंते ने यह गलती नहीं की। उन्होंने एक सामूहिक और अनुशासित 'ज़ोनल केज'
यानी एक ऐसा अदृश्य पिंजरा बनाया, जिसमें मेसी को फंसाया जा सके। इसका मतलब था कि मेसी जिस भी इलाके में जाते, उनके सबसे करीब मौजूद स्पेनिश खिलाड़ी उन्हें दबाने की कोशिश करता, जबकि बाकी खिलाड़ी पासिंग एंगल बंद कर देते। इस रणनीति का नेतृत्व मिडफील्ड में रोड्री कर रहे थे, जिन्होंने सुनिश्चित किया कि मेसी को गेंद के साथ सोचने और मुड़ने का समय ही न मिले। यह एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि पूरी टीम की जीत थी।
सप्लाई लाइन काटना: मेसी तक गेंद ही नहीं पहुंची
किसी भी महान खिलाड़ी को रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उस तक गेंद ही न पहुंचने दी जाए। स्पेन ने इसी सिद्धांत पर काम किया। उन्होंने अर्जेंटीना के मिडफील्ड पर लगातार दबाव बनाया। रोड्री, पेड्री और उनके साथियों ने अर्जेंटीना के एंजो फर्नांडीस जैसे रचनात्मक खिलाड़ियों को खुलकर खेलने का मौका नहीं दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि मेसी तक पहुंचने वाली सप्लाई लाइन कट गई। उन्हें गेंद लेने के लिए बार-बार अपने हाफ में बहुत पीछे आना पड़ रहा था, जिससे वो गोलपोस्ट से बहुत दूर हो गए और उनका खतरा अपने आप कम हो गया।
स्पेन के नए हथियार: आक्रमण ही सबसे अच्छा बचाव
इस स्पेनिश टीम की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ उसका डिफेंस नहीं, बल्कि उसका तेज-तर्रार आक्रमण था। लामिन यमाल और निको विलियम्स जैसे युवा विंगर्स ने अपनी गति और ड्रिब्लिंग से अर्जेंटीना के डिफेंस को लगातार पीछे हटने पर मजबूर किया। जब आपकी टीम पर लगातार हमले हो रहे हों, तो आपके सबसे बड़े खिलाड़ी को भी डिफेंस में मदद के लिए आना पड़ता है। स्पेन के आक्रामक खेल ने यह सुनिश्चित किया कि अर्जेंटीना की टीम जवाबी हमले के बारे में सोचने की बजाय अपना गोल बचाने में ही उलझी रहे। इस वजह से मेसी अक्सर मैदान के उस हिस्से में अलग-थलग पड़ गए, जहां से वह कोई बड़ा खतरा पैदा नहीं कर सकते थे।
मानसिक दबाव और धैर्य का खेल
फुटबॉल सिर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक खेल भी है। स्पेन के खिलाड़ियों ने पूरे 90 मिनट तक अविश्वसनीय धैर्य और अनुशासन दिखाया। उन्होंने मेसी को न तो कोई फाउल करने का मौका दिया और न ही उन्हें उकसाया। लगातार बिना जगह मिले खेलने की हताशा किसी भी खिलाड़ी पर हावी हो सकती है, चाहे वो कितना भी बड़ा क्यों न हो। स्पेन ने मेसी को वो छोटी सी जगह नहीं दी, जिसमें वह अपना जादू दिखा सकें। हर बार जब मेसी को लगा कि उनके पास मौका है, तो उनके सामने एक या दो स्पेनिश खिलाड़ी दीवार बनकर खड़े हो जाते थे। यह एक ऐसी मानसिक लड़ाई थी, जिसे स्पेन ने मैदान पर उतरने से पहले ही जीत लिया था।











