एक ऐतिहासिक संधि जिसने दुनिया को बदला
इसका जवाब 1959 की अंटार्कटिक संधि में निहित है। शीत युद्ध के चरम पर, जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव चरम पर था, 12 देश एक अभूतपूर्व समझौते के लिए एक साथ आए। इन देशों में वे राष्ट्र भी शामिल थे जो
पहले अंटार्कटिका के कुछ हिस्सों पर अपना दावा कर चुके थे, जैसे अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, चिली, फ्रांस, न्यूजीलैंड, नॉर्वे और यूके। इस संधि का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि "सभी मानव जाति के हित में अंटार्कटिका का उपयोग हमेशा विशेष रूप से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा और यह अंतरराष्ट्रीय कलह का दृश्य या वस्तु नहीं बनेगा।" 23 जून 1961 को लागू हुई यह संधि शीत युद्ध के दौरान पहला हथियार नियंत्रण समझौता था।
क्यों किसी देश का अंटार्कटिका पर हक़ नहीं?
संधि का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यह किसी भी देश को अंटार्कटिका पर संप्रभुता का दावा करने से रोकता है। इसने मौजूदा दावों को प्रभावी ढंग से स्थिर कर दिया, जिसका अर्थ है कि जिन देशों ने पहले दावे किए थे, वे उन्हें आगे नहीं बढ़ा सकते, और कोई भी नया दावा नहीं कर सकता। यह महाद्वीप किसी एक देश का नहीं है, बल्कि इसे कई संप्रभु राष्ट्रों द्वारा समान रूप से प्रबंधित किया जाता है। संधि यह स्पष्ट करती है कि अंटार्कटिका को एक असैन्यीकृत क्षेत्र बने रहना चाहिए, जहाँ सैन्य अड्डे बनाने, सैन्य अभ्यास करने या हथियारों का परीक्षण करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। इसके अलावा, किसी भी तरह के परमाणु विस्फोट और रेडियोधर्मी कचरे का निपटान भी यहाँ निषिद्ध है।
विज्ञान और शांति के लिए समर्पित महाद्वीप
अंटार्कटिक संधि की सफलता का एक बड़ा कारण इसका विज्ञान पर जोर देना है। यह संधि महाद्वीप पर वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता को बढ़ावा देती है और राष्ट्रों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करती है। संधि के तहत, सभी देशों को अपने वैज्ञानिक अवलोकन और परिणाम स्वतंत्र रूप से साझा करने होते हैं। आज, 58 देश इस संधि के पक्षकार हैं, जिनमें से 29 सलाहकार पक्ष हैं, जो निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। ये वे देश हैं जो वहां पर्याप्त वैज्ञानिक गतिविधि करके अंटार्कटिका में अपनी रुचि प्रदर्शित करते हैं। इस व्यवस्था ने अंटार्कटिका को एक विशाल प्राकृतिक प्रयोगशाला में बदल दिया है, जहां वैज्ञानिक पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण रहस्यों को उजागर करने के लिए मिलकर काम करते हैं।
बर्फ के नीचे क्या रहस्य छिपा है?
अंटार्कटिका में चल रहे शोध पृथ्वी के भविष्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए बर्फ की मोटी परतों से आइस कोर ड्रिल करते हैं। ये कोर लाखों साल पुरानी हवा के बुलबुले को सहेजे हुए हैं, जो हमें अतीत की जलवायु के बारे में बताते हैं। इसके अलावा, यहां खगोल विज्ञान, भूविज्ञान और जीव विज्ञान से जुड़े अनोखे शोध भी होते हैं। वैज्ञानिकों ने बर्फ की सतह के नीचे मीलों गहरी झीलों और नदियों की खोज की है, जहां ऐसे जीव पाए गए हैं जो लाखों वर्षों से बाकी दुनिया से अलग-थलग हैं। टेलर ग्लेशियर पर मौजूद 'ब्लड फॉल्स' (खूनी झरना) जैसी रहस्यमयी जगहें भी वैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं, जिसका लाल रंग लोहे से भरपूर खारे पानी के ऑक्सीकरण के कारण होता है। ये शोध हमें न केवल पृथ्वी के बारे में, बल्कि अन्य ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं के बारे में भी सिखाते हैं।
अंटार्कटिका में भारत की भूमिका
भारत 1983 में अंटार्कटिक संधि का सदस्य बना और तब से ध्रुवीय अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत ने 1981 में अपना पहला अंटार्कटिक अभियान शुरू किया था। देश ने महाद्वीप पर तीन स्थायी अनुसंधान बेस स्टेशन स्थापित किए हैं: दक्षिण गंगोत्री (1983), मैत्री (1989), और भारती (2012)। दक्षिण गंगोत्री अब एक आपूर्ति अड्डे के रूप में कार्य करता है, जबकि मैत्री और भारती पूरी तरह से चालू हैं। भारतीय वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन, समुद्र विज्ञान, भूविज्ञान और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण शोध करते हैं। हाल ही में, भारत ने पुराने हो चुके मैत्री स्टेशन को बदलने के लिए 'मैत्री-II' नामक एक नया और पर्यावरण के अनुकूल अनुसंधान केंद्र बनाने की योजना को मंजूरी दी है।













