'अर्बन हीट आइलैंड' आखिर है क्या?
अर्बन हीट आइलैंड (UHI) या शहरी ऊष्मा द्वीप, उस स्थिति को कहते हैं जब कोई शहरी क्षेत्र अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में काफी ज्यादा गर्म हो जाता है। कंक्रीट, डामर और ऊंची इमारतों से भरे शहर एक
तरह से गर्मी के द्वीप बन जाते हैं। यह तापमान का अंतर दिन के मुकाबले रात में और भी ज्यादा महसूस होता है, क्योंकि शहर की सतहें दिनभर सोखी हुई गर्मी को रात में धीरे-धीरे छोड़ती रहती हैं, जिससे रातें भी गर्म हो जाती हैं। भारतीय शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में यह अंतर 1 से 6 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया है।
शहरों को भट्टी बनाने वाले मुख्य कारण
इस बढ़ते तापमान के पीछे सबसे बड़ा कारण है हमारे शहरों का बदलता स्वरूप। प्राकृतिक जमीन, पेड़-पौधे और तालाबों की जगह अब कंक्रीट, डामर और कांच ने ले ली है। सड़कें, पार्किंग लॉट और इमारतों की गहरी रंग की छतें सूरज की गर्मी को सोखने का काम करती हैं, जबकि हरियाली वाष्पोत्सर्जन (evapotranspiration) के जरिए प्राकृतिक रूप से ठंडक पहुंचाती है। पेड़ों की कमी का मतलब है कम छाया और कम ठंडक। एक अध्ययन के अनुसार, पेड़ अर्बन हीट आइलैंड के प्रभाव से पैदा होने वाली अतिरिक्त गर्मी को लगभग आधा कम कर सकते हैं। इसके अलावा, ऊंची और पास-पास बनी इमारतें हवा के doğal बहाव को रोकती हैं, जिससे गर्मी एक ही जगह कैद होकर रह जाती है। इसे 'अर्बन कैनियन इफेक्ट' कहते हैं।
इंसानी गतिविधियां जो बढ़ा रहीं हैं गर्मी
शहरों की बनावट के अलावा, हमारी रोजमर्रा की गतिविधियां भी इस आग में घी का काम कर रही हैं। एयर कंडीशनर (एसी), गाड़ियां और फैक्ट्रियां लगातार गर्म हवा बाहर फेंकती हैं। खासकर गर्मियों में जब ठंडक के लिए एसी का इस्तेमाल बढ़ता है, तो ये उपकरण बाहर के तापमान को और बढ़ा देते हैं, जिससे एक खतरनाक चक्र शुरू हो जाता है। ज्यादा गर्मी का मतलब है ज्यादा एसी चलाना, और ज्यादा एसी चलने का मतलब है बाहर और ज्यादा गर्मी। शहरों में वाहनों की बढ़ती संख्या न केवल प्रदूषण फैलाती है, बल्कि उनके इंजन से निकलने वाली गर्मी भी सीधे तौर पर वातावरण को गर्म करती है।
क्यों साल-दर-साल बढ़ रहा है यह असर?
यह असर हर साल इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि जिन कारणों से यह पैदा होता है, वे लगातार बढ़ रहे हैं। भारत में शहरीकरण बहुत तेजी से हो रहा है। नए निर्माण में कंक्रीट और कांच का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है, जबकि हरे-भरे क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं। बढ़ती आबादी और आय के साथ, गाड़ियों और एसी की संख्या में भी भारी इजाफा हो रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अकेले शहरीकरण ने भारतीय शहरों में गर्मी को लगभग 60% तक बढ़ा दिया है। जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और भी गंभीर बना रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण पहले से ही तापमान बढ़ रहा है और जब यह अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव के साथ जुड़ जाता है, तो शहरों में जानलेवा हीटवेव की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
सेहत, बिजली बिल और पर्यावरण पर असर
बढ़ती शहरी गर्मी सिर्फ असुविधाजनक नहीं, बल्कि खतरनाक भी है। यह सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य पर असर डालती है, जिससे हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हृदय और सांस संबंधी बीमारियां बढ़ जाती हैं। यह समस्या खासकर बच्चों, बुजुर्गों और बाहर काम करने वाले मजदूरों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इसके अलावा, गर्मी बढ़ने से कूलिंग की मांग बढ़ती है, जिससे बिजली की खपत और बिल दोनों बढ़ते हैं। यह अतिरिक्त ऊर्जा मांग पावर ग्रिड पर दबाव डालती है और अगर बिजली कोयले से बन रही है, तो यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को भी बढ़ाती है। बढ़ा हुआ तापमान वायु प्रदूषण को भी बढ़ाता है, जिससे ग्राउंड-लेवल ओजोन जैसी हानिकारक गैसें बनती हैं।
क्या हैं इससे बचने और निपटने के उपाय?
अच्छी खबर यह है कि यह एक डिजाइन से जुड़ी समस्या है, इसलिए इसका समाधान भी बेहतर डिजाइन और योजना से संभव है। इसके लिए कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है। शहरों में हरियाली बढ़ाना सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है। ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाना, ग्रीन रूफ (छतों पर बागवानी) और वर्टिकल गार्डन बनाना तापमान को कम कर सकता है। इमारतों के निर्माण में 'कूल' या रिफ्लेक्टिव मैटेरियल का इस्तेमाल करना, जैसे कि सफेद या हल्के रंग की छतें, सूरज की गर्मी को सोखने के बजाय परावर्तित कर देती हैं। अहमदाबाद जैसे शहरों ने 'कूल रूफ्स' प्रोग्राम को सफलतापूर्वक अपनाया है। इसके अलावा, शहरी योजना में तालाबों और अन्य जल स्रोतों को सहेजना और हवा के बहाव के लिए जगह छोड़ना भी जरूरी है। ये सभी उपाय मिलकर हमारे शहरों को रहने के लिए ज्यादा ठंडा और सुरक्षित बना सकते हैं।















