FCRA Amendment Bill 2026: सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है। इस सत्र के लिए सरकार ने अपना विधायी एजेंडा पहले से तय कर दिया है, जिसमें सरकार 8 अहम विधेयकों को संसद में पेश करने और उन पर चर्चा करने की तैयारी में है। इसमें एक प्रमुख
विधेयक Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 जिसे लेकर काफी चर्चा है। आइए समझते हैं कि FCRA Bill क्या है और इसे लेकर सभी जरूरी बातें।
FCRA क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी थी?
Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA वर्ष 2010 में लागू किया गया था। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेशों से मिलने वाला पैसा भारत के राष्ट्रीय हित, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या संप्रभुता के खिलाफ इस्तेमाल न हो।
इस कानून के तहत कोई भी NGO, ट्रस्ट, सोसाइटी या संस्था विदेश से चंदा या ग्रांट तभी ले सकती है, जब उसके पास गृह मंत्रालय (MHA) का वैध FCRA रजिस्ट्रेशन या पूर्व अनुमति (Prior Permission) हो। यह रजिस्ट्रेशन पांच साल के लिए मान्य होता है और समय-समय पर इसका नवीनीकरण कराना पड़ता है।
फिलहाल देश में करीब 16,000 संस्थाएं FCRA के तहत पंजीकृत हैं और हर साल लगभग 22,000 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त करती हैं।
2026 के संशोधन में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
इस संशोधन का सबसे अहम प्रावधान "Designated Authority" का गठन है। यदि किसी NGO का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है, वह लाइसेंस सरेंडर कर देता है या समय पर रिन्यू नहीं कराता, तो उसके विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियां इस नामित प्राधिकरण के नियंत्रण में चली जाएंगी।
यह प्राधिकरण उन संपत्तियों का प्रबंधन करेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें बेच भी सकेगा। यदि संपत्ति की बिक्री होती है तो उससे मिलने वाली राशि भारत की Consolidated Fund of India में जमा की जाएगी। हालांकि यदि बाद में संस्था का लाइसेंस दोबारा बहाल हो जाता है तो बची हुई संपत्ति या अप्रयुक्त विदेशी फंड उसे वापस मिल सकता है।
NGO के पदाधिकारियों की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी
नए बिल में "Key Functionary" की परिभाषा को काफी व्यापक बनाया गया है। अब केवल निदेशक ही नहीं, बल्कि ट्रस्टी, पार्टनर, सोसाइटी के पदाधिकारी, HUF के कर्ता और संस्था के प्रबंधन से जुड़े अन्य जिम्मेदार लोग भी कानून के दायरे में आएंगे।
यदि संस्था की ओर से कोई उल्लंघन होता है तो इन अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माना जाएगा। हालांकि वे यह साबित कर सकते हैं कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं थी या उन्होंने पूरी सावधानी बरती थी।
जांच शुरू करने से पहले केंद्र की मंजूरी जरूरी होगी
संशोधन विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि किसी भी राज्य सरकार या जांच एजेंसी को FCRA से जुड़े मामलों में जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी।
सरकार का तर्क है कि इससे अलग-अलग एजेंसियों द्वारा समानांतर जांच की समस्या खत्म होगी और कानून का एक समान तरीके से पालन सुनिश्चित होगा। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इससे जांच प्रक्रिया और अधिक केंद्रीकृत हो सकती है।
जेल की सजा घटेगी, लेकिन नियम और सख्त होंगे
दिलचस्प बात यह है कि जहां एक ओर निगरानी और नियंत्रण बढ़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कानून के उल्लंघन पर अधिकतम जेल की सजा पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव रखा गया है।
इसके अलावा विदेशी फंड प्राप्त करने और उसके उपयोग की समय-सीमा तय करने, लाइसेंस समाप्त होने की स्पष्ट व्यवस्था और निलंबन के दौरान संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े नियमों को भी स्पष्ट किया गया है।
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बिल को लेकर उठ रहे हैं कौन-कौन से सवाल?
इस संशोधन को लेकर कई कानूनी और व्यावहारिक सवाल भी सामने आए हैं। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि यदि कोई संस्था अब विदेशी फंड नहीं ले रही है, लेकिन उसने पहले मिले विदेशी फंड से कोई अस्पताल, स्कूल या अन्य संपत्ति बनाई थी, तो केवल लाइसेंस रिन्यू न कराने पर भी वह संपत्ति सरकार के नियंत्रण में जा सकती है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे कई संस्थाएं चाहकर भी FCRA व्यवस्था से बाहर नहीं निकल पाएंगी, क्योंकि लाइसेंस खत्म होते ही उनकी संपत्तियों पर असर पड़ सकता है।
इसके अलावा बिल में लाइसेंस के नवीनीकरण से इनकार किए जाने की स्थिति में स्पष्ट अपील व्यवस्था नहीं होने और सुनवाई का अवसर नहीं देने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वहीं यदि किसी संपत्ति का निर्माण घरेलू और विदेशी दोनों स्रोतों से हुआ है, तो उसके स्वामित्व को लेकर भी विवाद पैदा हो सकता है।
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सरकार का क्या कहना है?
सरकार का कहना है कि इस संशोधन का उद्देश्य किसी ईमानदार NGO को परेशान करना नहीं, बल्कि विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना है। सरकार का दावा है कि कई मामलों में संपत्तियों के प्रबंधन और जवाबदेही को लेकर कानूनी अस्पष्टता थी, जिसे यह संशोधन दूर करेगा। सरकार का यह भी कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक हित और विदेशी फंड के पारदर्शी उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए यह बदलाव जरूरी है।














